Essay On Environment In Hindi

पर्यावरण (अंग्रेज़ी: Environment) शब्द का निर्माण दो शब्दों से मिल कर हुआ है। "पर्या" जो हमारे चारों ओर है, और "आवरण" जो हमें चारों ओर से घेरे हुए है। पर्यावरण उन सभी भौतिक, रासायनिक एवं जैविक कारकों की समष्टिगत इकाई है जो किसी जीवधारी अथवा पारितंत्रीय आबादी को प्रभावित करते हैं तथा उनके रूप, जीवन और जीविता को तय करते हैं।

सामान्य अर्थों में यह हमारे जीवन को प्रभावित करने वाले सभी जैविक और अजैविक तत्वों, तथ्यों, प्रक्रियाओं और घटनाओं के समुच्चय से निर्मित इकाई है। यह हमारे चारों ओर व्याप्त है और हमारे जीवन की प्रत्येक घटना इसी के अन्दर सम्पादित होती है तथा हम मनुष्य अपनी समस्त क्रियाओं से इस पर्यावरण को भी प्रभावित करते हैं। इस प्रकार एक जीवधारी और उसके पर्यावरण के बीच अन्योन्याश्रय का संबंध भी होता है।

पर्यावरण के जैविक संघटकों में सूक्ष्म जीवाणु से लेकर कीड़े-मकोड़े, सभी जीव-जंतु और पेड़-पौधे आ जाते हैं और इसके साथ ही उनसे जुड़ी सारी जैव क्रियाएँ और प्रक्रियाएँ भी। अजैविक संघटकों में जीवनरहित तत्व और उनसे जुड़ी प्रक्रियाएँ आती हैं, जैसे: चट्टानें, पर्वत, नदी, हवा और जलवायु के तत्व इत्यादि।

परिचय[संपादित करें]

सामान्यतः पर्यावरण को मनुष्य के संदर्भ में परिभाषित किया जाता है और मनुष्य को एक अलग इकाई और उसके चारों ओर व्याप्त अन्य समस्त चीजों को उसका पर्यावरण घोषित कर दिया जाता है। किन्तु यहाँ यह भी ध्यातव है कि अभी भी इस धरती पर बहुत सी मानव सभ्यताएँ हैं जो अपने को पर्यावरण से अलग नहीं मानतीं और उनकी नज़र में समस्त प्रकृति एक ही इकाई है जिसका मनुष्य भी एक हिस्सा है।[1] वस्तुतः मनुष्य को पर्यावरण से अलग मानने वाले वे हैं जो तकनीकी रूप से विकसित हैं और विज्ञान और तकनीक के व्यापक प्रयोग से अपनी प्राकृतिक दशाओं में काफ़ी बदलाव लाने में समर्थ हैं।

मानव हस्तक्षेप के आधार पर पर्यावरण को दो प्रखण्डों में विभाजित किया जाता है - प्राकृतिक या नैसर्गिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण।[2] हालाँकि पूर्ण रूप से प्राकृतिक पर्यावरण (जिसमें मानव हस्तक्षेप बिल्कुल न हुआ हो) या पूर्ण रूपेण मानव निर्मित पर्यावरण (जिसमें सब कुछ मनुष्य निर्मित हो), कहीं नहीं पाए जाते। यह विभाजन प्राकृतिक प्रक्रियाओं और दशाओं में मानव हस्तक्षेप की मात्रा की अधिकता और न्यूनता का द्योतक मात्र है। पारिस्थितिकी और पर्यावरण भूगोल में प्राकृतिक पर्यावरण शब्द का प्रयोग पर्यावास (habitat) के लिये भी होता है।

तकनीकी मानव द्वारा आर्थिक उद्देश्य और जीवन में विलासिता के लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु प्रकृति के साथ व्यापक छेड़छाड़ के क्रियाकलापों ने प्राकृतिक पर्यावरण का संतुलन नष्ट किया है, जिससे प्राकृतिक व्यवस्था या प्रणाली के अस्तित्व पर ही संकट उत्पन्न हो गया है। इस तरह की समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन कहलाती हैं।

पर्यावरणीय समस्याएँ जैसे प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन इत्यादि मनुष्य को अपनी जीवनशैली के बारे में पुनर्विचार के लिये प्रेरित कर रही हैं और अब पर्यावरण संरक्षण और पर्यावरण प्रबंधन की चर्चा है।[3] मनुष्य वैज्ञानिक और तकनीकी रूप से अपने द्वारा किये गये परिवर्तनों से नुकसान को कितना कम करने में सक्षम है, आर्थिक और राजनैतिक हितों की टकराव में पर्यावरण पर कितना ध्यान दिया जा रहा है और मनुष्यता अपने पर्यावरण के प्रति कितनी जागरूक है, यह आज के ज्वलंत प्रश्न हैं।[4][5]

नामोत्पत्ति[संपादित करें]

पर्यावरण शब्द संस्कृत भाषा के 'परि' उपसर्ग (चारों ओर) और 'आवरण' से मिलकर बना है जिसका अर्थ है ऐसी चीजों का समुच्चय जो किसी व्यक्ति या जीवधारी को चारों ओर से आवृत्त किये हुए हैं। पारिस्थितिकी और भूगोल में यह शब्द अंग्रेजी के environment के पर्याय के रूप में इस्तेमाल होता है।

अंग्रेजी शब्द environment स्वयं उपरोक्त पारिस्थितिकी के अर्थ में काफ़ी बाद में प्रयुक्त हुआ और यह शुरूआती दौर में आसपास की सामान्य दशाओं के लिये प्रयुक्त होता था। यह फ़्रांसीसी भाषा से उद्भूत है[6] जहाँ यह "state of being environed" (see environ + -ment) के अर्थ में प्रयुक्त होता था और इसका पहला ज्ञात प्रयोग कार्लाइल द्वारा जर्मन शब्द Umgebung के अर्थ को फ्रांसीसी में व्यक्त करने के लिये हुआ।[7]

पर्यावरण का ज्ञान[संपादित करें]

आज पर्यावरण एक जरूरी सवाल बल्कि ज्वलंत मुद्या बना हुआ है लेकिन आज लोगों में इसे लेकर कोई जागरूकता नहीं है। ग्रामीण समाज को छोड़ दे तो भी महानगरीय जीवन में इसके प्रति खास उत्सुकता नहीं पाई जाती। परिणामस्वरूप पर्यावरण सुरक्षा महज एक सरकारी एजेण्डा ही बन कर रह गया है। जबकि यह पूरे समाज से बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाला सवाल है। जब तक इसके प्रति लोगों में एक स्वाभाविक लगाव पैदा नहीं होता पर्यावरण संरक्षण एक दूर का सपना ही बना रहेगा।

पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध प्रकृति से है। अपने परिवेश में हम तरह-तरह के जीव-जन्तु, पेड़-पौधे तथा अन्य सजीव-निर्जीव वस्तुएँ पाते हैं। ये सब मिलकर पर्यावरण की रचना करते हैं। विज्ञान की विभिन्न शाखाओं जैसे-भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान तथा जीव विज्ञान, आदि में विषय के मौलिक सिद्धान्तों तथा उनसे सम्बन्ध प्रायोगिक विषयों का अध्ययन किया जाता है। परन्तु आज की आवश्यकता यह है कि पर्यावरण के विस्तृत अध्ययन के साथ-साथ इससे सम्बन्धित व्यावहारिक ज्ञान पर बल दिया जाए। आधुनिक समाज को पर्यावरण से सम्बन्धित समस्याओं की शिक्षा व्यापक स्तर पर दी जानी चाहिए। साथ ही इससे निपटने के बचावकारी उपायों की जानकारी भी आवश्यक है। आज के मशीनी युग में हम ऐसी स्थिति से गुजर रहे हैं। प्रदूषण एक अभिशाप के रूप में सम्पूर्ण पर्यावरण को नष्ट करने के लिए हमारे सामने खड़ा है। सम्पूर्ण विश्व एक गम्भीर चुनौती के दौर से गुजर रहा है। यद्यपि हमारे पास पर्यावरण सम्बन्धी पाठ्य-सामग्री की कमी है तथापि सन्दर्भ सामग्री की कमी नहीं है। वास्तव में आज पर्यावरण से सम्बद्ध उपलब्ध ज्ञान को व्यावहारिक बनाने की आवश्यकता है ताकि समस्या को जनमानस सहज रूप से समझ सके। ऐसी विषम परिस्थिति में समाज को उसके कर्त्तव्य तथा दायित्व का एहसास होना आवश्यक है। इस प्रकार समाज में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा की जा सकती है। वास्तव में सजीव तथा निर्जीव दो संघटक मिलकर प्रकृति का निर्माण करते हैं। वायु, जल तथा भूमि निर्जीव घटकों में आते हैं जबकि जन्तु-जगत तथा पादप-जगत से मिलकर सजीवों का निर्माण होता है। इन संघटकों के मध्य एक महत्वपूर्ण रिश्ता यह है कि अपने जीवन-निर्वाह के लिए परस्पर निर्भर रहते हैं। जीव-जगत में यद्यपि मानव सबसे अधिक सचेतन एवं संवेदनशील प्राणी है तथापि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु वह अन्य जीव-जन्तुओं, पादप, वायु, जल तथा भूमि पर निर्भर रहता है। मानव के परिवेश में पाए जाने वाले जीव-जन्तु पादप, वायु, जल तथा भूमि पर्यावरण की संरचना करते है।

शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण का ज्ञान शिक्षा मानव-जीवन के बहुमुखी विकास का एक प्रबल साधन है। इसका मुख्य उद्येश्य व्यक्ति के अन्दर शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संस्कृतिक तथा आध्यात्मिक बुद्ध एवं परिपक्वता लाना है। शिक्षा के उद्येश्यों की पूर्ति हेतु प्राकृतिक वातावरण का ज्ञान अति आवश्यक है। प्राकृतिक वातावरण के बारे में ज्ञानार्जन की परम्परा भारतीय संस्कृति में आरम्भ से ही रही है। परन्तु आज के भौतिकवादी युग में परिस्थितियॉं भिन्न होती जा रही हैं। एक ओर जहां विज्ञान एवं तकनीकी के विभिन्न क्षेत्रों में नए-नए आविष्कार हो रहे हैं। तो दूसरी ओर मानव परिवेश भी उसी गति से प्रभावित हो रहा है। आने वाले पीढ़ी को पर्यावरण में हो रहे परिवर्तनों का ज्ञान शिक्षा के माध्यम से होना आवश्यक हैं। पर्यावरण तथा शिक्षा के अन्तर्स म्बन्धों का ज्ञान हासिल करके को ई भी व्यक्ति इस दिशा में अनेक महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है। पर्यावरण का विज्ञान से गहरा सम्बन्ध है, किन्तु उसकी शिक्षा में किसी प्रकार की वैज्ञानिक पेचीदगिया नहीं हैं। शिक्षार्थियों को प्रकृति तथा पारिस्थितिक ज्ञान सीधी तथा सरल भाषा में समझी जानी चाहिए। शुरू-शुरू में यह ज्ञान सतही तौर पर मात्र परिचयात्मक ढंग से होना चाहिए। आगे चलकर इसके तकनीकी पहलुओं को विचार किया जाना चाहिए। शिक्षा के क्षेत्र में पर्यावरण का ज्ञान मानवीय सुरक्षा के लिए आवश्यक है।

पर्यावरण और पारितंत्र[संपादित करें]

पर्यावरण अपनी सम्पूर्णता में एक इकाई है जिसमें अजैविक और जैविक संघटक आपस में विभिन्न अन्तर्क्रियाओं द्वारा संबद्ध और अंतर्गुम्फित होते हैं। इसकी यह विशेषता इसे एक पारितंत्र का रूप प्रदान करती है क्योंकि पारिस्थितिक तंत्र या पारितंत्र पृथ्वी के किसी क्षेत्र में समस्त जैविक और अजैविक तत्वों के अंतर्सम्बंधित समुच्चय को कहते हैं। अतः पर्यावरण भी एक पारितंत्र है।[8]

पृथ्वी पर पैमाने (scale) के हिसाब से सबसे वृहत्तम पारितंत्र जैवमंडल को माना जाता है। जैवमंडल पृथ्वी का वह भाग है जिसमें जीवधारी पाए जाते हैं और यह स्थलमंडल, जलमण्डल तथा वायुमण्डल में व्याप्त है। पूरे पार्थिव पर्यावरण की रचना भी इन्हीं इकाइयों से हुई है, अतः इन अर्थों में वैश्विक पर्यावरण, जैवमण्डल और पार्थिव पारितंत्र एक दूसरे के समानार्थी हो जाते हैं।

माना जाता है कि पृथ्वी के वायुमण्डल का वर्तमान संघटन और इसमें ऑक्सीजन की वर्तमान मात्रा पृथ्वी पर जीवन होने का कारण ही नहीं अपितु परिणाम भी है। प्रकाश-संश्लेषण, जो एक जैविक (या पारिस्थितिकीय अथवा जैवमण्डलीय) प्रक्रिया है, पृथ्वी के वायुमण्डल के गठन को प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण प्रक्रिया रही है। इस प्रकार के चिंतन से जुड़ी विचारधारा पूरी पृथ्वी को एक इकाई गाया[9] या सजीव पृथ्वी (living earth) के रूप में देखती है।[10]

इसी प्रकार मनुष्य के ऊपर पर्यवारण के प्रभाव और मनुष्य द्वारा पर्यावरण पर डाले गये प्रभावों का अध्ययन मानव पारिस्थितिकी और मानव भूगोल का प्रमुख अध्ययन बिंदु है।[11][12][13]

पर्यावरणीय समस्याएँ[संपादित करें]

मुख्य लेख : पर्यावरणीय अवनयन

* यह भी देखें: प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन

ज्यादातर पर्यावरणीय समस्याएँ पर्यावरणीय अवनयन और मानव जनसंख्या और मानव द्वारा संसाधनों के उपभोग में वृद्धि से जुड़ी हैं। पर्यावरणीय अवनयन के अंतर्गत पर्यावरण में होने वाले वे सारे परिवर्तन आते हैं जो अवांछनीय हैं[14] और किसी क्षेत्र विशेष में या पूरी पृथ्वी पर जीवन और संधारणीयता को खतरा उत्पन्न करते हैं। अतः इसके अंतर्गत प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता का क्षरण और अन्य प्राकृतिक आपदाएं इत्यादि शामिल की जाती हैं। पर्यावरणीय अवनयन के साथ मिलकर जनसंख्या में चरघातांकी दर से हो रही वृद्धि तथा मानव द्वारा उपभोग के बदलते प्रतिरूप लगभग सारी पर्यावरणीय समस्याओं के मूल कारण हैं।

संसाधन न्यूनीकरण[संपादित करें]

संसाधन न्यूनीकरण का अर्थ है प्राकृतिक संसाधनों का मनुष्य द्वारा अपने आर्थिक लाभ हेतु इतनी तेजी से दोहन कि उनका प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्भरण (replenishment) न हो पाए। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में संसाधन क्षरण के लिये जनसंख्या के दबाव, तेज वृद्धि दर और लोगों के उपभोग प्रतिरूप का भी प्रभाव जिम्मेवार माना जा रहा है।[15][16]

संसाधनों को दो वर्गों में विभक्त किया जाता है - नवीकरणीय संसाधन और अनवीकरणीय संसाधन। इसके आलावा कुछ संसाधन इतनी पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं कि उनका क्षय नहीं हो सकता उन्हें अक्षय संसाधन कहते हैं जैसे सौर ऊर्जा।

अनवीकरणीय संसाधनों का तेजी से दोहन उनके भण्डार को समाप्त कर मानव जीवन के लिये कठिन परिस्थितियां पैदा कर सकता है। कोयला, पेट्रोलियम, या धत्वित्क खनिजों के भण्डारों का निर्माण एक दीर्घ अवधि की घटना है और जिस तेजी से मनुष्य इन का दोहन कर रहा है ये एक न एक दिन समाप्त हो जायेंगे। वहीं दूसरी ओर कुछ नवीकरणीय संसाधन भी मनुष्य द्वारा इतनी तेजी से प्रयोग में लाये जा रहे हैं कि उनका प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा पुनर्भरण उतनी तेजी से संभव नहीं और इस प्रकार वे भी अनवीकरणीय संसाधन की श्रेणी में आ जायेंगे।

प्रदूषण[संपादित करें]

प्रदूषण अथवा पर्यावरणीय प्रदूषण पर्यावरण में किसी पदार्थ (ठोस, द्रव या गैस) अथवा ऊर्जा (ऊष्मा, ध्वनि, रेडियोधर्मिता इत्यादि) के प्रवेश को कहते हैं यदि इसकी गति इतनी तेज हो कि सामान्य और प्राकृतिक प्रक्रियाओं द्वारा इसका परिक्षेपण, मंदन, वियोजन, पुनर्चक्रण अथवा अहानिकारक रूप में संरक्षण न हो सके।[17] इस प्रकार प्रदूषण के दो स्पष्ट सूचक हैं, किसी पदार्थ या ऊर्जा का पर्यावरण में प्रवेश और उसका प्राकृतिक पर्यावरण के प्रति हानिकारक या अवांछित होना। इस तरह के अवांछित तत्व को प्रदूषक या दूषक कहते हैं।

प्रदूषण का वर्गीकरण प्रदूषक के प्रकार, स्रोत अथवा पारितंत्र के जिस हिस्से में उसका प्रवेश होता है, के आधार पर किया जाता है। उदाहरण के तौर पर वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, इत्यादि प्रकार इस आधार पर निश्चित किये जाते हैं कि पारितंत्र के इस हिस्से में दूषक तत्व का प्रवेश होता है। वहीं दूसरी ओर रेडियोधर्मी प्रदूषण, प्रकाश प्रदूषण, ध्वनि या रव प्रदूषण इत्यादि प्रकार प्रदूषक के खुद के प्रकार पर आधारित वर्गीकरण हैं।

जलवायु परिवर्तन[संपादित करें]

जैवविविधता ह्रास[संपादित करें]

प्राकृतिक आपदाएँ[संपादित करें]

इनमें चक्रवात, तेज तूफान, अत्यधिक बारिश, सूखा आदि शामिल है।

पर्यावरण संरक्षण[संपादित करें]

मुख्य लेख : पर्यावरण संरक्षण

पर्यावरण प्रबंधन[संपादित करें]

मुख्य लेख : पर्यावरण प्रबंधन

पर्यावरण प्रबंधन का तात्पर्य पर्यावरण के प्रबंधन से नहीं है, बल्कि आधुनिक मानव समाज के पर्यावरण के साथ संपर्क तथा उस पर पड़ने वाले प्रभाव के प्रबंधन से है। प्रबंधकों को प्रभावित करने वाले तीन प्रमुख मुद्दे हैं राजनीति (नेटवर्किंग), कार्यक्रम (परियोजनायें) और संसाधन (धन, सुविधाएँ, आदि)। पर्यावरण प्रबंधन की आवश्यकता को कई दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है।

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण चिंतन[संपादित करें]

भारतीय संस्कृति में पर्यावरण को विशेष महत्त्व दिया गया है। प्राचीन काल से ही भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के अनेक घटकों जैसे वृक्षों को पूज्य मानकर उन्हें पूजा जाता है। पीपल के वृक्ष को पवित्र माना जाता है। वट के वृक्ष की भी पूजा होती है। जल, वायु, अग्नि को भी देव मानकर उनकी पूजा की जाती है। समुद्र, नदी को भी पूजन करने योग्य माना गया है। गंगा, सिंधु, सरस्वती, यमुना, गोदावरी, नर्मदा जैसी नदीयों को पवित्र मानकर पूजा की जाती है। धरती को भी माता का दरज्जा दीया गया है। प्राचीन काल से ही भारत में पर्यावरण के विविध स्वरुपो की पूजा होती है।[18][19][20]

पर्यावरण विज्ञान[संपादित करें]

पर्यावरण विधि[संपादित करें]

मुख्य लेख : पर्यावरण विधि

भारत में[संपादित करें]

पर्यावरणीय विधि अथवा पर्यावरण विधि समेकित रूप से उन सभी अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय सन्धियों, समझौतों और संवैधानिक विधियों को कहा जाता है जो प्राकृतिक पर्यावरण पर मानव प्रभाव को कम करने और पर्यावरण की संधारणीयता बनाये रखने हेतु हैं।

भारत में पर्यावरण क़ानून पर्यावरण (रक्षा) अधिनियम 1986 से नियमित होता है जो एक व्‍यापक विधान है। इसकी रूप रेखा केन्‍द्रीय सरकार के विभिन्‍न केन्‍द्रीय और राज्‍य प्राधिकरणों के क्रियाकलापों के समन्‍वयन के लिए तैयार किया गया है जिनकी स्‍थापना पिछले कानूनों के तहत की गई है जैसा कि जल अधिनियम और वायु अधिनियम।

अन्य विधियों में भारतीय वन अधिनियम, 1927 और वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 प्रमुख हैं।

एक राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण का भी गठन किया गया है।[21]

अन्तर्राष्ट्रीय[संपादित करें]

यह अनुभाग खाली है, अर्थात पर्याप्त रूप से विस्तृत नहीं है या अधूरा है। आपकी सहायता का स्वागत है!

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. ↑Jamieson, Dale. (2007). The Heart of Environmentalism. In R. Sandler & P. C. Pezzullo. Environmental Justice and Environmentalism. (pp. 85-101). Massachusetts Institute of Technology Press.
  2. ↑बासक, अनिंदिता - पर्यावरणीय अध्ययन, गूगल पुस्तक, (अभिगमन तिथि 04-08-2014
  3. ↑सुरेश लाल श्रीवास्तव प्रतियोगिता दर्पण, मार्च, २००९
  4. ↑सुरेश लाल श्रीवास्तव प्रतियोगिता दर्पण, मार्च, २००९
  5. ↑मधु अस्थानापर्यावरण एक संक्षिप्त अध्ययन
  6. ↑अंग्रेजी विक्षनरी
  7. ↑Online etymology dictionary
  8. ↑सविन्द्र सिंह, जैव भूगोल, प्रयाग पुस्तक भवन
  9. ↑गाया परिकल्पना, ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी पर (अभिगमन तिथि 05-08-2014)
  10. ↑Lovelock, J.E. (1 अगस्त 1972). "Gaia as seen through the atmosphere". Atmospheric Environment (1967) (Elsevier) 6 (8): 579–580.
  11. ↑Richards, Ellen H. (1907 (2012 reprint))Sanitation in Daily Life, Forgotten Books. pp. v.
  12. ↑आर॰ डी॰ दीक्षित, भौगोलिक चिंतन का विकास पृष्ठ सं॰ 253, गूगल पुस्तक (अभिगमन तिथि 25-07-2014)
  13. ↑हार्लेन एच॰ बैरोज, (1923), Geography as Human Ecology, Annals of the Association of American Geographers, 13(1):1-14
  14. ↑Johnson, D.L., S.H. Ambrose, T.J. Bassett, M.L. Bowen, D.E. Crummey, J.S. Isaacson, D.N. Johnson, P. Lamb, M. Saul, and A.E. Winter-Nelson. 1997. Meanings of environmental terms. Journal of Environmental Quality 26: 581–589.
  15. ↑Richard Anderson, Resource depletion: Opportunity or looming catastrophe?, BBC News पर, (अभिगमन तिथि 05-08-2014)
  16. ↑Fred Magdoff, Global Resource Depletion: Is Population the Problem?, Monthly Review, 2013, Volume 64, Issue 08 (January), (अभिगमन तिथि 05-08-2014)
  17. ↑pollution (environment), Encyclopedia Brittanica; "pollution, also called environmental pollution, the addition of any substance (solid, liquid, or gas) or any form of energy (such as heat, sound, or radioactivity) to the environment at a rate faster than it can be dispersed, diluted, decomposed, recycled, or stored in some harmless form."
  18. ↑http://hindi.speakingtree.in/spiritual-articles/science-of-spirituality/content-246889
  19. ↑http://hi.vikaspedia.in/rural-energy/policy-support/92d93e930924-915940-92a93094d92f93e935930923-92894092493f
  20. ↑http://m.jagran.com/uttar-pradesh/varanasi-city-11365556.html
  21. ↑राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

Posted by saddam husen

» hindi essay

» Tuesday, August 30, 2016

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Essay on Environment in Hindi- पर्यावरण पर हिंदी में निबंध 


अगर हमको एक बढ़िया जीवन जीना है तो हमको अपने पर्यावरण के बारे में पता होना चाहिये! पर्यावरण के बिना हम एक बढ़िया जीवन नहीं जी सकते है! लेकिन आज के time में हम सब मिलकर पर्यावरण को बहुत ही बेकार कर रहे है! अगर बात करे की आखिर ये पर्यावरण किसको कहते है तो इसको हम इस प्रकार परिभाषित कर सकते है! 

"हमारे आश पास दिखाई देने वाले हर एक चीज़ हमारे पर्यावरण में आता है!"

बिना पर्यावरण के हम इस ग्रह पर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते है! अगर पर्यावरण ना होता तो ये ग्रह भी दुसरे ग्रह की तरह होता और यहाँ पर भी जीवन नहीं होता है! पर्यावरण में  कीड़े-मकोड़े से लेकर  पेड़-पौधे सभी आते है! लोगो ने पर्यावरण को दो भागो में बाटा है प्राकृतिक पर्यावरण और मानव निर्मित पर्यावरण!  मानव निर्मित पर्यावरण से हमारे प्राकृतिक पर्यावरण पर बहुत प्रभाव पड़ता है! आज के time हम लोगो पर्यावरण के नियम से बहुत  छेड़छाड़ करते है जिसके कारण पर्यावरण का संतुलन बहुत ही तेजी से बिगड़ रहा है! अगर ये  छेड़छाड़ ऐसे ही चलता रहा है तो इससे पर्यावरण पर एक बहुत बड़ा संकट आ जायेगे! पर्यावरण में बहुत से ऐसी समस्याएँ है जिनके कारण हमारे जीवन पर एक संकट पैदा होता रहता है! आज के समय में हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या ये है की हम अपने पर्यावरण के प्रति कितनी जागरूक है! पर्यावरण  'परि' और  'आवरण'  से मिलकर बना है! जिसका अर्थ आदमी और  जीवधारी के चारो के चीजों को कहते है! पर्यावरण को हम अंग्रेजी में environment कहते है! 

आज पर्यावरण पुरे दुनिया में एक बहुत बड़ा मुददा बन गया है! लेकिन इसको लेकर कोई भी आज जागरूक नहीं है! पर्यावरण को सबसे ज्यादा खतरा शहरों से है! बड़े बड़े शहरों में बड़े बड़े कारखाने हमारे पुरे पर्यावरण को बहुत प्रभावित करता है! शहरों के मुकाबले गावो में पर्यावरण को उतना ज्यादा प्रदूषित नहीं करते है! आज हम सब को पर्यावरण संरक्षण के बारे में बहुत गंभीर होकर सोचना होगा! लोगो को पर्यावरण के प्रति जागरूक करना पड़ेगा! पर्यावरण का सीधा सम्बन्ध प्रकृति से है! हमको अपने प्रकृति को ठीक करने के लिए पर्यावरण संरक्षण करना होगा! हमारे आस पास रहने वाले सभी  जीव-जन्तु, पेड़-पौधे और अन्य ऐसी चीज़े जिनमे जान होता है ये सब मिलकर  पर्यावरण का निर्माण करते है! एक बढ़िया  पर्यावरण का निर्माण करने के लिए ये जरुरी है की हम सब मिलकर पर्यावरण संरक्षण करे! पर्यावरण संरक्षण करने के लिए हमको इसके बारे में अपने आने वाली पीढ़ी को बताना होगा! जब हमारे आने वाली पीडी को इसके बारे में पता चलेगा तभी वह पर्यावरण संरक्षण कर पायेगे! शिक्षा के माध्यम हम सभी को पर्यावरण का ज्ञान लोगो को देना होगा! अगर हम आज की बात करे तो हम कह सकते है की एक तरह आज इस दुनिया में जिस तरह से नए नए चीजों की खोज हो रही है उसी प्रकार हम लोग रोज अपने पर्यावरण को बहुत ही तेजी से  प्रभावित कर रहे है! पर्यावरण का हमारे तकनीक और विज्ञानं से एक बहुत गहरा रिश्ता है! इसलिए ये जरुरी है की हम पढाई के माध्यम से पर्यावरण के उपयोगिता को लोगो को बताये! और पर्यावरण को बढ़िया बनाने में अपना पूरा योगदान दे-

Essay on Environment in Hindi - Part 2

प्रकृति  ने इस दुनिया में  जीवन की स्थापना करने के लिए पर्यावरण को एक भेट के रूप में दिया है! हम अपने जीवन में जीने के लिए जिन जिन चीजों का उपयोग करते है वह सभी चीज़े पर्यावरण में आती है! हमारा पर्यावरण इस दुनिया में जीवन का अस्तित्व बनाये रखता है! पृथ्वी एक ऐसा प्लेस है पुरे  ब्रह्मांड की जंहा  पर जीवन जीना समभाव है! पृथ्वी पर जीवन को जीना इसलिए समभाव है क्योकि पृथ्वी का पर्यावरण हमारे जीवन के जीने योग्य है! अगर हमारा पर्यावरण हमारे अनुसार नहीं होती तो कभी भी पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती थी! पर्यावरण के खिलाप लोगो को जागरूक करने के लिए पूरी दुनिया हर साल 5 जून को  विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है! हर साल 5 जून को  विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का मुख्य कारण ये होता है की वह इसके द्वारा लोगो को पर्यावरण के खिलाप जागरूक करते है! अगर हम सब मिलकर छोटी छोटी बातो का ध्यान से दे हम सब मिलकर पर्यावरण को बढ़िया बना सकते है! यदि आपको ये नहीं पता है की आखिर पर्यावरणीय प्रदूषण किसको कहते है तो मै आपको बताता हु की पर्यावरणीय प्रदूषण किसको कहते है! 

" हमारे पर्यावरण में किसी भी तरह के  पदार्थ  अथवा ऊर्जा के प्रवेश को कहते हैं!"

पर्यावरण प्रदूषण मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते है!  वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण! वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण के कारण ही हमारा पर्यावरण प्रभाबित करता है! और हमारे पर्यावरण को सबसे ज्यादा खतरा इन तीन चीजों से ही है! अगर हमको पर्यावरण को जीने लायक बनाना है तो हमको  वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण पर पूरा कंट्रोल करना होगा! प्रकृति का संतुलन बनाए रखने के लिए हमको अपने पर्यावरण संतुलन बनाये रखना होगा! अगर प्रकृति का या फिर पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाता है तो इसका सीधा असर हमारे जीवन पर पड़ेगा! प्रकृति या पर्यावरण का संतुलन को सबसे ज्यादा मानव बिगाड़ रहा है! यदि हम प्रकृति के अनुशासन के खिलाफ गलत तरीके से कुछ भी करते हैं तो ये पूरे वातावरण के माहौल को बहुत खराब कर देगा! इसलिए हमको यही कोशिश करना चाहिये की हमको पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ने के बजाये उसको बनाये रखना चाहिये! भारत सरकार ने  पर्यावरण क़ानून भी बनाया है जिसके द्वारा वह पर्यावरण की सुरछा करते है! पूरी दुनिया के देशो को  पर्यावरण क़ानून बनाना होगा ताकि सभी मिलकर एक बढ़िया वातावरण का निर्माण कर सके! तभी जाकर हमको अपने पर्यावरण को बढ़िया बनाने में मदद मिलेगी!

Paryavaran Sanrakshan essay in hindi


आज के इस तकनीक की दुनिया में जिस प्रकार से तकनीक का विकास हो रहा है उससे इन दुनिया में जीवन की संभावनाओं भी कम होती जा रही है! क्योकि मानव तकनीक के बिकसित करने के लिए हमारे पर्यावरण का सहारा ले रहा है! जिसके कारण हमारे पर्यावरण बिगड़ रहा है! प्रकृति का संतुलन बनाये रखने के लिए हमको मानव और पर्यावरण के बीच एक मजबूत संतुलन बनाये रखना बहुत जरुरी है! अगर किसी कारण के वजह से  प्रकृति का संतुलन बिगड़ गया तो सारे मानव जाति को बहुत बड़े खतरे का सामना करना पड़ेगा! इसलिए हम सभी को मिलकर  प्रकृति का संतुलन बनाये रखने के लिए पर्यावरण और मानव के बीच एक जीवन चक्र को चलाना होगा! पर्यावरण का संतुलन बिगड़ना आज मानव जाति के लिए एक बहुत बड़ी समस्या है! और इस समस्या का समाधान हम सभी को मिलकर करना होगा! और सभी मानव जाति को पर्यावरण के संतुलन बिगड़ने से होने वाले महाविनाश के बारे जागरूक करना होगा! जब इस दुनिया में सभी लोगो को पर्यावरण के संतुलन बिगड़ने से होने वाले महाविनाश के बारे पता होगा तभी सभी लोग पर्यावरण के संतुलन के बिगड़ने से रोकने में अपना प्रयाश करेगे! ये हम सभी का एक फर्ज है की हम सभी लोगो को पर्यावरण के बारे में जागरूक करे! तो चलो दोस्तों आज हम सब मिलकर ये संकल्प लेते है की हम सब मिलकर पर्यावरण के संरक्षक में अपना पूरा योगदान देंगे! 

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